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मुआवज़ा

 टीम: नकुल सिंह साहनी, हेगन डेसा, शौनक सेन, इमरान खान 

सन् 2013 के 7 और 8 सितम्बर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़्ज़फ़रनगर और शामली ज़िले आज़ाद भारत के अपने सबसे बड़े दंगे के गवाह बने। सूत्रों के मुताबिक़ 100 से अधिक लोग मारे गए और क़रीब 80000 लोग विस्थापित हुए।  

90% से ज़्यादा पीड़ित मुसलमान थे। दंगा पीड़ितों का सदमा सिर्फ़ हिंसा तक सीमित नही रहा। अप्रयाप्त और ख़राब सरकारी सुविधाओं के चलते राहत शिविरों में 100 से ज़्यादा बच्चों की मौत हुई। राज्य सरकार ने हर विस्थापित परिवार के लिए 5,00,000 रूपये की घोषणा की थी। नरसंहार के चार साल बाद भी कई पीड़ित परिवारों को अभी तक मुआवज़ा नहीं मिला।

'मुआवज़ा' फ़िल्म तीन तीन दंगा पीड़ितों, सनाउर, सलीम और इनाम, की ज़िंदगियों को क़रीब से देखती है। इन तीनों को आज भी अपना मुआवज़ा नहीं मिला। सरकार के कठोर रवैय्ये के बावज़ूद तीनों अपनी ज़िंदगियों को नए सिरे से शुरू करने का संकल्प लेते हैं। 'मुआवज़ा' 2013 के दंगे के बाद और आज की उनकी ज़िंदगियों के बीच में इंटरकट करती है। जहाँ एक तरफ़ वह अपनी परिस्थितियों से जूझते हुए अपनी ज़िंदगियों को फिर से खड़ा करने की कोशिश करते हैं, लेकिन दंगे के कई सारे अनदेखे पहलू आज भी उनकी ज़िंदगियों को प्रभावित करते हैं, अक्सर बहुत ही दर्दनाक तरीकों से।  

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